बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरक्षण को जायज़ करार दिया

Bombay high court

मराठा आरक्षण पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने 27 जून 2019 को अपना फैसला सुना दिया है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र में सरकारी नौकरियों और शिक्षा में मराठा समुदाय के लिए आरक्षण की वैधता को बरकरार रखा है. कोर्ट ने कहा है कि मराठा आरक्षण को 16 फीसदी से घटाकर 12 या 13 फीसदी करना चाहिए.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा की राज्य सरकार को आरक्षण देने का अधिकार है. अदालत ने एसईबीसी (SEBC) के कमीशन की रिपोर्ट को माना है. गायकवाड़ कमीशन रिपोर्ट के अनुसार, 12-13% आरक्षण दिया जाना चाहिए और इस बात को कोर्ट भी मानता है.

मराठा आरक्षण पर फैसला आने से पहले मुंबई पुलिस ने बॉम्बे हाईकोर्ट के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी थी, ताकि किसी भी तरह की अनहोनी को रोकने के लिए मुंबई पुलिस पहले से तैयार रहे. महाराष्ट्र के लोगों में खुशी की लहर है. अब उन्हें महाराष्ट्र की सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण मिलेगा.

महाराष्ट्र सरकार ने साल 2018 में मराठा समुदाय के लोगों को शिक्षा और सरकारी नौकरी में 16 फीसदी आरक्षण दिया था. हाइकोर्ट में इसके खिलाफ और समर्थन में कई याचिकाएं दायर की गई है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद 26 मार्च 2019 को अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण के खिलाफ दायर उस याचिका पर 24 जून को विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी.

मराठा आरक्षण कब लागू हुआ था?
महाराष्ट्र विधानसभा ने 30 नवंबर 2018 को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग (एसईबीसी) श्रेणी के तहत मराठों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 16 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव पारित किया था. आरक्षण को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में कई याचिकाएँ दायर की गईं थी.

लंबे समय तक चला आंदोलनमहाराष्ट्र के अलग-अलग इलाकों में मराठा समुदाय ने आरक्षण की मांग को लेकर कई बड़े मोर्चे निकाले गए थे.

आरक्षण की मांग 1980 के दशक से लंबित:
मराठों के आरक्षण की मांग 1980 के दशक से लंबित पड़ी थी. राज्य पिछड़ा आयोग ने 25 विभिन्न मानकों पर मराठों के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक आधार पर पिछड़ा होने की जांच की. इसमें से सभी मानकों पर मराठों की स्थिति दयनीय पाई गई. इस दौरान किए गए सर्वे में करीब 43 हजार मराठा परिवारों की स्थिति जानी गई.
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